
Friday, 1 January 2010
2010

उगते सूरज को सलाम करने वालो के समाज में २०१० का स्वागत.....
२०१० के आने से पहले जिस तरह से लोगो में इसके स्वागत को लेकर उत्साह देखने को मिला ....वो काफी हद तक हमारी अक्तार्फी सोच को ही उजागर करता है.....
हमारे राजनेताओ की जीवन शैली का असर अब आम जन पर दिखने लगा है....हमारे लोकतंत्र में सदा से आने वाले का स्वागत किया जाता है और जाने वाले से किनारा.....कुछ ऐसा ही नए साल का जश्न मनाने में लगे लोगो ने किया....एक साल तक जो उनके सुख-दुःख का साथी रहा उसे एक पल में ही भुला दिया....पुरे एक साल तक जिसने दुनिया के रंगों को हमारे सामने पल-पल प्रस्तुत किया उसे एक ही पल में भुला देना, हमारी स्वार्थ प्रवृति का नमूना नहीं तो और क्या है?
पिछले बीस सालो से हमारे समाज में आ रही यही परवर्ती हमारे नैतिक मूल्यों के विनाश का कारन बनती जा रही है....हम लोगो ने चकाचौंध से भरी पाश्चात्य जीवन शैली में खोकर स्वयं को सस्ती लोकापिर्यता की वस्तुभर बना लिया है.....अब न हमारे पास संस्कार बचे है और न ही संस्कार देने वाली माताएं अब हमारे समाज में बची है....ऐसे में अब खोखली हो चुकी जीवनशैली में हमारे समाज में मानवता कब तक जीवित रहेगी ये देखने वाली बात है....
२००९ का आभारी है की उसने हमारे समाज से मानवता का पुर्न्ना विनाश नहीं होने दियता दिया....
और २०१० से उम्मीद है की वो भी इस क्रम को कायम रखेगा.....
Thursday, 12 November 2009
सूरज अस्त हो रहा है

सूरज अस्त हो रहा है हमारे समाज का
सूरज अस्त हो रहा है हमारे संस्कारो का
सूरज अस्त हो रहा है हमारे आने वाले कल का
kon है इसका dosi
शायद हम और तुम
हमने नाम और पैसे की भूख me
bachche को nokar के hawale कर
उसकी ma को bhej दिया noukari करने
vo सुबह से sham तक घर से bahar रहती है
आते समय kurkare la कर bete को दे
karwa देती उसे ahasas की ma उसे करती है प्यार
ये kurkure का प्यार ही कर रहा है
आने वाले कल का surya अस्त
ये noukari वाली ma ही कर रही है
आने वाले कल को संस्कार vahina
nokar के hatho pala हुआ हमारा कल
kesa होगा.............?
kalpana करने से की kamp jati है ruh
sochata hu chand paiso के लिए
ma kese dur हो jati है अपने bachche से........
सच......
सूरज अस्त हो रहा है हमारे कल का
....................................................................
Sunday, 4 October 2009
मेरी खुशी ...... मेरे साथ .......
वक्त ने करीब तीन साल पहले मजबूर कर दिया था एक अनजान परिवार को अपने परिवार का हिस्सा बनाने के लिए....तीन सालो में बहुत कुछ मुझे उनसे मिला और बहुत कुछ शायद उन्हें भी मुझ से मिला हो ...पर नही मिला तो वो था मेरा और उस परिवार का स्वभाव .... विचारो में एकरूपता जो इन तीन सालो में कभी भी नही आ पाई ...उन्हें लगता था की मैं हिटलर हू...तानाशाह हू...और मुझे लगता था की वे चापलुश और स्वार्थी लोग है....विचारो की इन्ही गड़बड़ झाले में हम तीन सालो तक साथ रहे.....दोनों ही तरफ से अविश्वाश के साथ ..... तीन साल बाद अचानक विस्फोट हुआ..... सब कुछ अलग हो गया... अब वो और मैं या फिर यूँ कहे की हम दोनों परिवार नदी के दो किनारे बन गए है....जो कभी एक नही हो सकते....इस दूरी का मुझे कोई गिला या शिकवा नही है....न ही मुझे रिश्ते की इस टूटन पर कई अफसोस है.....पता नही क्यों ऐसा है....? वरना रिश्ते के टूटने पर गम होना चाहिए.....दर्द होना चाहिए.....पर .... मेरे साथ ऐसा कुछ भी नही है.....अब लगता है की उनके दूर होने पर भी खुशी का मेरे पास यु ही रहना साफ करता है की हमारे बीच में शायद कोई रिश्ता था ही नही.... हम मात्र वक्त के मिलाने पर मिले हुए अनजान लोग थे....जो वक्त आने पर अलग-अलग हो गए........ या फिर हो सकता है मुझे रिश्तो की कदर करनी नही आती....पर जो भी हो मैं अपने-आप से खुश हूँ .... और यही कारण है की मेरी खुशिया हरदम मेरे साथ रहती है......
अब आप क्या सोचते है?
हमारे रिश्ते बने थे या नही?
मैं खुश हूँ ....इसका कारण ये तो नही की मैं इस पहले रिश्ते को वजन मान कर ही कुलीपना कर रहा था?
या फिर मुझे वाकई में रिस्तो की कदर नही है?
............आप छाए जो भी सोचे ....पर मुझे लगता है की मैं खुश हूँ -इसलिए मैं कभी ग़लत नही था......
Friday, 14 August 2009
दुविधा प्रसाद जी......
सुबह होते ही मेरे दोस्त दुविधा प्रसाद जी आ टपके...टपके इस लिए बोल रहा हू की वो कभी भी कहीं भी बुलावे परआते-जाते नही...बल्कि अचानक टपक पड़ते है...पुरे महौले की चिंता....समाज की चिंता...धर्म की चिंता...देश कीचिंता...विदेश की चिंता...चिंता ही चिंता है उनके पास में...चिंता इतनी की उनका पुरा जीवन ही अब चिंता बन गयाहै...पास की लड़की ने प्रेम - विवाह किया चिंतित हुए दुविधा प्रसाद जी...मुंबई में हमला हुआ तो परेशान दुविधाप्रसाद जी .... बीजेपी की हार हुई दुखी हुए दुविधा प्रसाद जी...दाल-चीनी के भाव बढे रातभर सोये नही दुविधा प्रसादजी...देश में बिजली का संकट आया तो पसीने-पसीने हुए दुविधा प्रसाद जी...आस्ट्रेलिया में हमले हुए भारत में कम्कम्पाये दुविधा प्रसाद जी....सरकार ने सम्लैगिता पर बयान दिया धर्म संकट में पड़े दुविधा प्रसादजी...haryana की खाप पंचायत ने फैसला दिया सहमे गुजरात में बैट्ठे दुविधा प्रसाद जी.... ये दुविधा प्रसाद अकेले मेरे ही दोस्त नही है...हर किसी के पास ऐसे एक-आध दोस्त होते है....जिनकी पुरी जिन्दगी ही चिंता में बीत जाती है...चिंता भी कैसी ...... जिसका उसके जीवन से कोई लेना-देना नही होता और न ही उसके पास उन चिन्ताओ का कोई हल होता है...एक दिन वो इसी चिंता में दुनिया को अलविदा कह जाते है... बिना किसी अर्थ के पशु का जीवन जी कर चले जाते है...जीवन से दूर....जीवन जीने वाले हर आदमी में दुविधा प्रसाद चौकडी मर के बैटते रहते है.....अब आप में दुविधा प्रसाद बैट्ठे है या नही- ये देखना आपका काम है.....
Sunday, 26 July 2009
Tuesday, 20 January 2009
इज्जत...

अपनी-अपनी सोच होती है। अपने-अपने तर्क होते है। परन्तु सोच और तर्क ... उस समय धरे के धरे रह जाते है जब कोई निरपराध को सजा मिल जाती है। मुझे आज तक एक घटना रात को अक्सर जगा देती है...विचलित कर देती है। मेरे साथ एक लड़की पढ़ती थी... अनामिका बोलते थे सभी उसे...हवा का झोंका थी...तैरती रहती थी सदा मधुर संगीत की तरह.... । हमसे दो कैलास नीचे एक लड़का .... उसे दिल ही दिल चाहने लगा.... एक-दो बार अनामिका से बात की...उससे दोस्ती की बात कही...अनामिका ने मना कर दिया..फिर चार-पाँच बार कोशिश की....हर बार नाकाम रहा..एक दिन उसने अनामिका को कैलास के बहार रोक लिया ...और अपने हाथ की कलाई कट ली... । मैंने सब कुछ देखा और पुरी घटना को कलम से विस्तृत रूप दे समाचार बना छाप दिया....उस दिन के बाद अनामिका दिखाई नही दी... धीरे-धीरे समय बीत गया...पेपर आ गए...अनामिका अपने पिता जी के साथ आई...चुपचाप...खामोश...बिल्कुल उदास.... । हवा में तैरने वाली अनामिका के पास आकर अब हवा भी खामोशी की चादर में लिपट रही थी... । पेपर ख़त्म होने पर अनामिका मेरे पास आई और बोली..... आख़िर मेरा कसूर क्या था...? आपकी ख़बर हुई ..... लोगो ने दिल लगाकर पढ़ी और किसी की जिन्दगी दाव पर लग गई... । अनामिका के ये शब्द आज भी मुझे रात को जगा देते है... । और सोचने को मजबूर कर देते है की .... आख़िर छेड़छाड़ की ख़बर का असर पीडिता पर ही क्यों पड़ता है...? शायद ....... हमारे सभ्य समाज में आज भी नारी मात्र भोग की ही वास्तु मणि जाती है....और इज्जत की ठेकेदारी का सारा बोझ उस पर ही होतो है...... । पुरुषः तो कुछ भी करने के लिए आजाद है-गली के कुत्ते की तरह ।
Monday, 19 January 2009
उलझन....

कई बार ऐसी उलझन में मन फंस जाता है की हंसते-खेलते रिश्तो में भी दरार आ जाती है...उस वक्त जीवन के सारे अर्थ अनर्थ में तब्दील हो जाते है और ये रंगीन दुनिया फिर काँटों की सेज लगने लगती है.... ।
मेरे संपर्क में एक ऐसा ही खुशहाल दम्पति था....गरीबी के आँचल में भी दोनों खुश। दोनों के पास दुनिया को अपनी नजर से देखने का एक प्यारा सा सपना भी था....वो थी उनकी ३-४ साल की मासूम और प्यारी सी बेटी। पर गरीब के पास खुशियों का बसेरा कम ही होता है...जालिम समाज गरीब को खुश देख ही नही सकता... ।
समाज के कुछ दरिंदो की नजर इस परिवार पर पड़ी....फिर शुरू हुई एक साजिश.... । इस साजिश का शिकार बना वह गरीब परिवार... । दरिंदो ने पहले दम्पति में से पुरूष को अपना शिकार बनाया... । उसे अपना दोस्त बनाया । उसे शराब पीनी सिखाई । उसे पराई नारी के पास ले जाया गया । फिर उनकी नजर गई उसकी बीबी पर.... । उसे मीठी -मीठी बातो में फुसलाया गया...हँसी-मजाक से सफर शुरू किया... । फ़िर उसे दोस्ती की ऑफर की । वो भयभीत हो गई.. ऐसे में उसने एक सहेली को पुरी बात बताई... । उसकी सहेली ने भी उसे ग़लत दिशा देते हुए दोस्ती करने की सलाह दे दी... बस यही से शुरू हो गया उलझन का रास्ता... । दरिंदा उसे अब अपनी हवाश का शिकार बनाना चाहता था.... । कभी शादी का झांसा देकर .... तो कभी बड़े-बड़े सपने दिखा कर.... । मिया-बीबी में रोजाना तकरार होने लगी... । पति पत्नी पर शक करने लगा.... । परन्तु पत्नी यकीं दिलाती रही....पर कोई फायदा नही....बिना कुछ किए ही वो गुन्हा के घेरे में थी....केवल दोस्ती करने और बात करने की सजा उसे चरित्रहीन के रूप में मिल रही थी....सभी समाज भी मजा ले रहा था.... । बिना कुछ जाने हर कोई उसे ग़लत कह रहा था..... । इसे वो सहन नही कर सकी ....और दो दिन पहले उसने फंसी पर लटक कर जान देने की कोशिश की...उसे बचा तो लिया गया.....पर रिश्तो में आई उलझन यु की त्यों बनी रही..... । शहर को छोड़ दम्पति फ़िर अपने गाँव चला गया ..... उलझन को कम करने के लिए...... ।
और मैं सोचता रहा पुरी रात की आख़िर कसूर किसका था... ??
दरिन्दे का...?
सहेली का.....?
पति का........?
या फिर पत्नी का.....?
फिर लगा इन में से किसी का भी नही..... । कसूर था सोच का...समाज का....najariye का ...
और.......इसकी सजा मिली एक खुशहाल परिवार को.......... ।
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